आदाब,
हमें भी कोई बताए क्या यही चिकन है?
जो महीनों कारीगर की उंगलियों में घूमता हुआ महीन महीन तेज नोक वाली सुइयों से निखरता हुआ और कभी-कभी कारीगर की उंगलियों से तागे के साथ रिस्ता हुआ खून भी कपड़ों पर रच जाता है,
क्या यही चिकन है?
हां यही चिकन है.
मगर दुनिया तो तागे और कपड़े के मिलने को चिकन कहती है.
इतिहास भी बहुत कुछ कहता है |
और एक मजे की बात सुनिए आजकल Google Google खूब चल रहा है , बटन दबाओ और दुनिया मुट्ठी में हमने भी अपने बेटे से पता किया और Google खुल गया …….अरे सुनिए तो आगे क्या हुआ, हमने कहा लखनवी चिकन तो जनाब फौरन एक लाल लाल मुर्गा हमको नजर आने लगा.
इतिहास ने कहा…
नवाब आसफ उद दौला ने उन लोगों को यह काम दिया जो घर से बाहर आकर काम करने में असमर्थ थे और गरीबी के अभाव से दबते चले जा रहे थे, सोचने की बात यह है कि घर के अंदर कौन ……
जाहिर है “औरत”
यानी गौर करने की बात है सदियों पहले औरत घर में रहकर बिना दुनिया के दांव-पेंच देखें और तब भी इतनी हुनरमंद, सारे कामों में निपुण दिन रात बच्चों पति और घर के तमाम सदस्यों की देखभाल करते-करते हाथों में इतनी ताकत और चांद सी सफाई कहां से ले आती थी (शायद उस जमाने में बोर्नविटा और बूस्ट भी ना मिलते हो ) जो बेजान चीजों में (तागे, कपड़े ) को मिलाकर इतना खूबसूरत रूप दे देती थी कि राजा, महाराजा ,नवाब , सारे के सारे जिनके पास साटन सिल्क ,पश्मीना और हीरो जणित कपड़ों का ज़ख़ीरा होता था पर वह यह सूती कपड़े पहनने को मजबूर हो जाते थे .
जिन हाथो ने कभी अमीरी का एहसास ना किया हो मारे खौफ के हाथ न फैला पाए , अगर कोई ऊंची आवाज में उन्हें पुकार ले , हजारों किससे ऐसे होंगे जो कागज पर बिखर ना पाए , पर एक बात और करने की है इन सब कारनामों के पीछे सिर्फ एक ही तस्वीर नजर आती है और शायद हर एक को नजर भी ना आए क्योंकि उसको महसूस करने के लिए हमें आंखों में बरसात की मिट्टी सा बोसीदापन चांद की चांदनी सी ठंडी ठंडी चमक और मोम सा दिल जो पिघलना बखूबी जानता हो और जरूरत पड़ने पर किसी के अंधेरे को दूर भी कर सके .
औरत के सामने दुनिया बेइंतेहा छोटी और बोनी नजर आती है “क्यों?” हर जगह हर गोशे मे और हर घर में कुदरत ने औरत का रुतबा बुलंद किया है , उसने कपड़ा पकड़ा तो तन ढक गया , घास उंगलियों से टकराई बर्तन बनकर रसोई घर में शान बन गई, कागज किताबों को गले लगाया तो आला अफसर बन गई, जरूरत पड़ने पर लोहे को लेकर तलवार की शक्ल में अपने दुश्मनों के सामने आकर अपना लोहा मनवा गई,
मां की शक्ल से शुरू होती है और कभी कहीं खत्म ना होने वाली इस नियामत को सारे जहां का सलाम.
इसी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा हम भी हैं ..
नाम ...सैयद हैदर आगा ...सरकार ने कई तमगो (अवॉर्ड्स) से नवाजा है…
उमर 46 साल , पिछले 27 सालों से काम करते हुए जिससे चिकन कहते हैं डूबकर किया खूब दिल से किया पर अब लगने लगा है कि सदियां कम है किसी अच्छाई को पूजने के लिए वह जिस चाहत की सीमा नहीं ,
आप सबका हैदर
29 मार्च 2017



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